दृशा असल में इस बच्ची का कातिल है कौन क्या सच में उसके ससुराल वाले या उसके खुद के मां-बाप मुझे उसके मां-बाप भाई के प्रति आज सहानुभूति का अनुभव नहीं हो रहा है क्योंकि अपनी बेटी के कातिल यही लोग हैं उसका ससुराल वाले नहीं ससुराल वालो ने तो हर बार मौका दिया था कि हमें तुम्हारी लड़की नहीं रखती ले जाओ उसे पर गंदे इल्जाम लगे उसे हर तरह से गलत साबित कर रहे थे तब भी मां-बाप चुप बैठे हुए थे बेटी हर बार बोल रही थी मेरे साथ सही नहीं हो रहा मेरा हस्बैंड हर तरह के नशे करता है और भी उसमें कुछ सामाजिक बुराइयां है जो समाज के हित के में नहीं है बजाये उसे नर्क से निकलने के अपने दामाद को यह समझा कर आता है कि नशा मत करो अपनी कुछ गलत आदतों को सुधार लो मुझे समझ नहीं आता तृषा के पिता ने खुद को कौन सा अवतार मान लिया जो वह समझाएगा और उसका दामाद समझ जाएगा.
तृषा लगातार अपने साथ होते हुए गलत व्यवहार को अपने माता-पिता को सूचित कर रही थी परंतु माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे थे बजाये उसको वापस लाने के उसको वहीं पर छोड़ दिया कुछ परिस्थितियों में खास तौर से शादी के बाद लड़कियों के साथ और यहां तो शातिर लोगों की बात हो रही है यह सब तो क्राइम के खेले खाये लोग थे क्राइम की गतिविधियों के बीच में वकील और जज होने के नाते इन लोगों की लाइफ गुजर गई थी हमेशा जो ससुराल में जो लड़कियां मार दी जाती हैं उसमें अधिकतर मां बाप का बड़ा हाथ होता है कैसे होता है यह बताती हूं यहाँ पर डार्क साइकोलॉजी काम करती है ससुराल वाले पहले थोड़ा टॉर्चर करते हैं पहले ही वह मानसिक या फिजिकल टॉर्चर वह लड़की के घर वालों की पावर को देखते हैं लड़की शिकायत करती है पर मां-बाप उसकी सुनवाई नहीं करते फिर टॉर्चर और बढ़ाया जाता है ससुराल पक्ष हर बार लड़की के माता-पिता को मौका देता है कि वक्त है अपने बच्चों को बचा लो मां बाप अपनी हरकत से और अपनी जिम्मेदारियां से मुंह मोड़ ते हुए उन्हें यह हिंट देते हैं कि आप उसके साथ जो जो चाहे वह कर सकते हैं इसके साथ! हमारी तरफ से आपको छूट है हमारे लिए अपने बच्चों से ज्यादा समाज प्यार है वह समाज जो हमें अपने आसपास आज नजर नहीं आ रहा है हां एक बार वह शादी में देखा था और एक बार इसकी मैयत पर देखेंगे समाज बहुत अच्छा है हमारे संग थोड़ा रोएगा और फिर कोने में जाकर ग्रुप बनाएगा और अपनी बातें कर हंसेगा और फिर अचानक से वह गायब हो जाएगा इस समाज के लिए हम अपने बच्चों को कुर्बान करने के लिए तैयार है दरअसल समाज तो एक बहाना है मां-बाप किसी भी तरह से अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाना चाहते हैं चाहे फिर उनका बच्चा कुर्बान ही क्यों न कर दिया जाए वरना एक सच्चाई यह भी है कि ऐसे मां-बाप की बेटी क्यों नहीं मरती जो अपने बच्चों के लिए जान देना भी जानते हैं और जान लेना भी जानते हैं वह समाज को कोई अहमियत नहीं देते वह सिर्फ अपने बच्चों की खुशियों को और उसकी जिंदगी किस तरह से सुरक्षित रहेगी इस चीज को अहमियत देते हैं.
आज ट्विशा की मां को दिखाया जा रहा है उसको रोक-रो कर बुरा हाल है और वह जगह-जगह अपनी बेटी के लिए इंसाफ मांग रही है कभी यह सोचा कि जब उसकी बच्ची खुद अपनी मां से इंसाफ मांग रही थी तब उसने अपने बच्चों के साथ क्या कोई इंसाफ किया या जब उसको चोट पहुंचाई जा रही थी तब वह कैसे तड़प रही होगी उसके सब कोई थे पर सच में यह है कि उसका कोई भी नहीं था
मां दूसरे पीएम की मांग कर रही है शर्म नहीं आ रही जबकि होना यह चाहिए था कि इस मन को एक नहीं उसके साथ बहुत से पीएम होना चाहिए थे और इसकी मांग उन्हें करनी चाहिए थी मैं तो इस बात से हैरान हूं जिन्होंने उसके बच्चे की जान ले ली उनके हाथ अभी तक खाली क्यों है उन लोगों की गर्दन उनके हाथ में क्यों नहीं है ऐसी स्थिति में केवल ससुराल वाले नहीं नहीं मां बाप भी उनके उतने ही जिम्मेदार हैं ससुराल वालों के साथ साथ इन लोगों को भी उतनी ही सजा मिलनी चाहिए ताकि आगे से कोई भी मां-बाप समाज के नाम पर अपने बच्चों की कुर्बानी ना दे. कुछ कानून मां बाप के खिलाफ भी बने चाहिए अगर यह पुष्टि हो जाती है कि उनकी बेटी ने वक्त रहते अपने साथ होते गलत व्यवहार को अपने मां-बाप भाई बहन को सूचित किया था और उन्होंने उसे वक्त पर उसका साथ नहीं दिया तो उनके लिए भी एक सजा निर्धारित होनी चाहिए.
लेखिका ( रेखा चौधरी)









